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दरगाह में तैनात पीआरडी जवान या नज़राना वसूलने वाले ख़ादिम.? साबिर पाक की चौखट पर सुरक्षा व्यवस्था बेनकाब, हिफाज़त साबिर पाक के भरोसे..!

✍ Super Admin 🕒 10 Feb 2026, 07:32 PM
दरगाह में तैनात पीआरडी जवान या नज़राना वसूलने वाले ख़ादिम.? साबिर पाक की चौखट पर सुरक्षा व्यवस्था बेनकाब, हिफाज़त साबिर पाक के भरोसे..!

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रुड़की: पिरान कलियर स्थित दरगाह साबिर पाक की मुक़द्दस ज़मीन पर आज हालात ऐसे बनते जा रहे हैं मानो पूरा निज़ाम सिर्फ़ “भरोसे” के सहारे चल रहा हो। दरगाह की व्यवस्थाओं के लिए बाक़ायदा एक दफ़्तर इजाद किया गया है—जहां एक प्रबंधक, कई सुपरवाइज़र, दर्जनों कर्मचारी और सुरक्षा के नाम पर पीआरडी जवानों की तैनाती भी मौजूद है। मगर ज़मीनी हक़ीक़त इससे बिल्कुल उलट नज़र आती है।

दरगाह शरीफ़ में सुरक्षा व्यवस्था मज़बूत करने के उद्देश्य से जिन पीआरडी जवानों को वर्दी में तैनात किया गया था, वही अब कथित तौर पर ख़ादिमों की भूमिका में नज़र आ रहे हैं। सुरक्षा से उनका कोई सरोकार दिखाई नहीं देता। आलम यह है कि वही जवान जायरीनों को हाज़िरी तक कराते दिखते हैं और नज़राने के खेल में उनकी भूमिका पर भी सवाल उठते हैं।

दरगाह परिसर में आए दिन झगड़े, गाली-गलौच और बदज़ुबानी की घटनाएं आम हो चुकी हैं। हाज़िरी के नाम पर डेरा जमाए कुछ महिलाएं खुलेआम उत्पात मचाती नज़र आती हैं—भद्दी गालियां, अभद्र भाषा और दरगाह की जालियों पर चढ़कर मुक़द्दसता को तार-तार करने के मंजर अब किसी से छिपे नहीं हैं। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो इन हालात की जीती-जागती तस्वीर पेश करते हैं।

यही नहीं, जायरीनों की सुरक्षा तो जैसे पूरी तरह राम भरोसे छोड़ दी गई है। भीड़भाड़ वाले दिनों, ख़ासतौर पर जुमेरात को, जेबकतरों का गिरोह सक्रिय रहता है। कई जायरीन अपनी जमा पूंजी तक गवां बैठते हैं, मगर न कोई पूछने वाला है और न रोकने वाला।

गौरतलब है कि इससे पहले भी दरगाह परिसर में संगीन घटनाएं हो चुकी हैं—कथित मानसिक विक्षिप्त द्वारा जालियों पर हथौड़े से हमला, और हाज़िरी के बहाने जालियां पकड़कर गुम्बद पर लगे सोने के कलश तक नीयत गड़बड़ाने जैसी वारदातें प्रशासन की नींद खोलने के लिए काफ़ी थीं। इन्हीं घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए पीआरडी जवानों की तैनाती की गई थी, जिनका दायित्व सिर्फ़ और सिर्फ़ सुरक्षा व्यवस्था देखना था।

मगर अफ़सोस… आज वही पीआरडी जवान अपने असल फ़र्ज़ से भटके हुए नज़र आते हैं। सवाल यह है कि जब रक्षक ही तमाशबीन या हिस्सेदार बन जाएं, तो फिर दरगाह की गरिमा, जायरीनों की आबरू और अमन-ओ-अमान की ज़िम्मेदारी आखिर किसके कंधों पर है..?

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